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मोहम्मद शमी: क्रिकेट के मैदान पर इबादत या कट्टरता का शिकार?

Mohammad Shami Faces Fatwa for Not Fasting and Playing for India – A Debate on Religion and Sports
Mohammad Shami Faces Fatwa for Not Fasting and Playing for India – A Debate on Religion and Sports
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भारतीय क्रिकेट के तेज़ गेंदबाज मोहम्मद शमी ने अपने प्रदर्शन से कई बार देश का गौरव बढ़ाया है। लेकिन कुछ लोग उनकी इस उपलब्धि को सराहने के बजाय उनके धार्मिक विश्वासों पर सवाल उठाते हैं। हाल ही में, एक विवाद सामने आया जिसमें यह कहा गया कि शमी ने रमजान के दौरान रोज़ा नहीं रखा और भारत के लिए खेलते रहे। इस पर कट्टरपंथियों ने उन्हें 'अपराधी' करार दिया और उनके खिलाफ फतवा जारी करने की धमकी दी। खेल, खासकर पेशेवर स्तर पर, मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत demanding होता है। कई मुस्लिम एथलीट अपनी फिटनेस और प्रदर्शन को बनाए रखने के लिए रोज़ा नहीं रखते, जबकि कुछ इसे निभाते हैं। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत निर्णय है, और इस पर सवाल उठाना किसी का अधिकार नहीं होना चाहिए। मोहम्मद शमी का पेशा उन्हें देश का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी देता है। जब वह भारत के लिए खेलते हैं, तो उनकी प्राथमिकता अपने खेल में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होती है। क्या हम किसी डॉक्टर, सैनिक या अन्य पेशेवरों से यह उम्मीद कर सकते हैं कि वे अपनी ड्यूटी छोड़ दें? फिर एक क्रिकेटर के लिए अलग नियम क्यों? यह पहली बार नहीं है जब किसी खिलाड़ी या सेलिब्रिटी के खिलाफ फतवा जारी करने की धमकी दी गई हो। इससे पहले भी, सानिया मिर्ज़ा, शाहरुख खान और कई अन्य मुस्लिम हस्तियों को धार्मिक कारणों से निशाना बनाया गया है। कट्टरपंथी तत्वों द्वारा फतवों को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। शमी ने इस पूरे विवाद पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, क्योंकि वह जानते हैं कि उनका खेल ही उनका सबसे बड़ा जवाब है। उन्होंने बार-बार अपने प्रदर्शन से आलोचकों को चुप कराया है। 2019 वर्ल्ड कप हो या 2023 का क्रिकेट वर्ल्ड कप, उनकी गेंदबाजी ने भारत को कई जीत दिलाई हैं। भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में किसी भी व्यक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर जज करना अनुचित है। खेल को धर्म से जोड़ना न केवल अनुचित है, बल्कि यह देश के खिलाड़ियों के मनोबल को भी गिराने का काम करता है। मोहम्मद शमी को भारतीय क्रिकेट के हीरो के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि उनकी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर। आइए हम खेल को सिर्फ खेल रहने दें और खिलाड़ियों को उनके प्रदर्शन के आधार पर आंकें, न कि उनकी व्यक्तिगत आस्थाओं के आधार पर।