कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को महाराष्ट्र के नंदुरबार में एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारतीय संविधान को लेकर गंभीर आरोप लगाए। गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने संविधान को कभी पढ़ा ही नहीं है, और उसे खाली किताब मानते हैं। गांधी के अनुसार, संविधान भारत की आत्मा है और यह महात्मा गांधी, डॉ. बी.आर. अंबेडकर और बिरसा मुंडा जैसे महान नेताओं के मूल्यों को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भाजपा को संविधान की लाल किताब से आपत्ति है, लेकिन कांग्रेस इसे संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, मोदी जी को लगता है कि यह संविधान खोखला है, क्योंकि उन्होंने इसे पढ़ा नहीं है। लेकिन यह किताब भारत के आदर्शों और संस्कृति की गहराई को समेटे हुए है। इसे खोखला कहना उन सभी महान नेताओं का अपमान है, जिन्होंने हमारे देश को दिशा दी है।"
गांधी ने आदिवासियों, दलितों और पिछड़े वर्गों के अधिकारों को लेकर भी भाजपा पर हमला किया। उन्होंने भाजपा और आरएसएस पर आदिवासियों को आदिवासी के बजाय वनवासी कहने का आरोप लगाया, जिससे उनके अधिकारों को सीमित करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा, आदिवासी देश के पहले मालिक हैं, और जल, जंगल, ज़मीन पर उनका पहला अधिकार है। उन्होंने बिरसा मुंडा के संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने आदिवासी अधिकारों के लिए अपनी जान दी थी।
राहुल गांधी ने महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के घोषणापत्र पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि एमवीए ने अपने घोषणापत्र में महिलाओं, किसानों और युवाओं के लिए 3,000 रुपये मासिक सहायता और मुफ्त बस यात्रा जैसी सुविधाएं देने का वादा किया है। इसके साथ ही 3 लाख रुपये तक की कृषि ऋण माफी और बेरोज़गार युवाओं को 4,000 रुपये प्रतिमाह देने का भी प्रावधान रखा गया है।
गांधी ने जाति जनगणना की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि इससे आदिवासियों, दलितों और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व का स्पष्ट आकलन होगा। उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र में आदिवासी आबादी का आठ प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन निर्णय लेने में उनका प्रतिनिधित्व एक प्रतिशत से भी कम है।
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि महाराष्ट्र में कई प्रमुख औद्योगिक परियोजनाएं, जैसे वेदांता-फॉक्सकॉन सेमीकंडक्टर प्लांट और टाटा-एयरबस निर्माण इकाइयाँ, दूसरे राज्यों में स्थानांतरित कर दी गईं, जिससे राज्य में लगभग पांच लाख नौकरियां चली गईं। उन्होंने सरकार के प्रमुख पदों पर आदिवासियों के सीमित प्रतिनिधित्व पर भी चिंता व्यक्त की। गांधी ने कहा कि 90 वरिष्ठ अधिकारियों में से केवल एक अधिकारी आदिवासी समुदाय से है, जो आदिवासी समाज के लिए चिंताजनक स्थिति है।
गांधी ने मीडिया और कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी आदिवासियों, दलितों और पिछड़े वर्गों की भागीदारी को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि इन समुदायों की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि देश की सत्ता संरचना में उनका भी बराबरी का हिस्सा हो।
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