पोस्ट के वायरल होते ही आम नागरिकों की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। कई लोगों ने लिखा कि "कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए, चाहे वो आम नागरिक हो या प्रधानमंत्री।" सोशल मीडिया पर लोग इस मुद्दे को लेकर जोरदार बहस कर रहे हैं।
हालांकि, ये पहली बार नहीं है जब आम जनता ने अधिकारियों या जनप्रतिनिधियों की गलतियों की ओर ध्यान दिलाया हो। 1982 में भी एक ऐसा मामला सामने आया था, जब दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी को नो-पार्किंग ज़ोन में खड़ी होने के कारण टो कर लिया था।
लेकिन इस बार का मामला थोड़ा अलग है। जिन गाड़ियों की बात की जा रही है, वे प्रधानमंत्री के निजी स्वामित्व वाली नहीं हैं। पीएम के काफिले में शामिल गाड़ियां सरकारी होती हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) या संबंधित सरकारी एजेंसियों के नाम पर पंजीकृत होती हैं। ऐसे में यह कहना कि पीएम मोदी को स्वयं ये चालान भरने चाहिए, कानूनी रूप से गलत है।
यह मामला बताता है कि कैसे सोशल मीडिया पर जानकारियों को सही संदर्भ में समझना ज़रूरी है। जहां एक ओर जनता की सजगता सराहनीय है, वहीं तथ्यों की सटीकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।